गीता जयंती: भ्रम के समय में धर्म की लौ
आज जब दुनिया नैतिक दिशाहीनता के संकट से गुजर रही है, तब गीता जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सभ्यता की चेतना का पुनःस्मरण है। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो वंशों का संघर्ष नहीं था—वह मनुष्य के भीतर चल रहे अनंत युद्ध का प्रतीक था। इस युद्ध में कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्राब्दियों पहले था।
भगवद्गीता हमें सिखाती है कि धर्म स्थिर नहीं, बल्कि सक्रिय साहस है—अन्याय के सामने खड़े होने का, भ्रम के बीच स्पष्टता चुनने का, और कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य निभाने का। यह वह दर्शन है जो भारत को शताब्दियों तक आक्रमणों, विकृत इतिहास और सांस्कृतिक हमलों के बावजूद अडिग रखता आया है।
आज जब वैश्विक विमर्श अक्सर भारत को उसकी सभ्यता-गत विरासत से काटने की कोशिश करता है, गीता की यह सीख और भी महत्वपूर्ण हो जाती है—अपनी जड़ों से जुड़े बिना कोई राष्ट्र आधुनिक नहीं बन सकता। गीता जातीय, भौगोलिक या राजनीतिक सीमाओं में बंधी पुस्तक नहीं; यह भारत की आत्मा की सार्वकालिक ध्वनि है।
समकालीन भारत के लिए गीता का संदेश स्पष्ट है—
कर्तव्य का पालन करो, सत्य पर अडिग रहो, और भ्रम फैलाने वाली विचारधाराओं के सामने झुको नहीं।
कृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध का नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान दिया था—वह विज्ञान जो आज की पीढ़ियों को भी नैतिक दृढ़ता और मानसिक संतुलन दे सकता है।
गीता जयंती हमें याद दिलाती है कि भारत की ताकत केवल उसके संविधान, सेना, तकनीक या अर्थव्यवस्था में नहीं—बल्कि उस सभ्यतागत आत्मविश्वास में है, जो गीता जैसे ग्रंथों से उत्पन्न होता है। जो राष्ट्र अपनी जड़ों को समझता है, उसे दुनिया दिशा नहीं दिखा सकती।
आज के दिन, गीता के 700 श्लोक केवल पढ़ने की चीज़ नहीं—वे जीने का मार्ग हैं, और भारत को भविष्य की ओर ले जाने वाली नैतिक रोशनी भी।
यह जयंती केवल स्मरण नहीं—पुनर्जागरण है।
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